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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
गृहेभ्य एव निष्क्रम्य वनमन्ये समाश्रिताः |  २०   क
गृहमेवाभिसंश्रित्य ततोऽन्ये व्रह्मचारिणः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति