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शान्ति पर्व
अध्याय १७५
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भृगुरु उवाच
ते चाप्यन्तं न पश्यन्ति नभसः प्रथितौजसः |  २५   क
दुर्गमत्वादनन्तत्वादिति मे विद्धि मानद ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति