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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
आनन्त्यमनुय़ुङ्क्ते यः कर्मणा तद्व्रवीमि ते |  ३   क
निरागममनैतिह्यं प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति