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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
षष्ठं छागमय़ं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तत् |  १२   क
षट्शिरोऽभ्यन्तरं राजन्नित्यं मातृगणार्चितम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति