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शल्य पर्व
अध्याय ४२
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वैशम्पाय़न उवाच
वय़ं हि क्षुधिताश्चैव धर्माद्धीनाश्च शाश्वतात् |  १५   क
न च नः कामकारोऽय़ं यद्वय़ं पापकारिणः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति