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शान्ति पर्व
अध्याय ७५
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मुचुकुन्द उवाच
नाहं राज्यं भवद्दत्तं भोक्तुमिच्छामि पार्थिव |  १८   क
वाहुवीर्यार्जितं राज्यमश्नीय़ामिति कामय़े ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति