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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
धर्म इत्येव ये यज्ञान्वितन्वन्ति निराशिषः |  ४   क
उत्पन्नत्यागिनोऽलुव्धाः कृपासूय़ाविवर्जिताः |  ४   ख
धनानामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति