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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
ऋतं सत्यं विदितं वेदितव्यं; सर्वस्यात्मा जङ्गमं स्थावरं च |  ४४   क
सर्वं सुखं यच्छिवमुत्तमं च; व्रह्माव्यक्तं प्रभवश्चाव्ययश्च ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति