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शान्ति पर्व
अध्याय २६२
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कपिल उवाच
पुरस्ताद्भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः |  ९   क
चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवाधिसंहताः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति