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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् |  ९   क
कालं त्विमं परं स्कन्द व्रह्मणा सह चिन्तय़ ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति