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वन पर्व
अध्याय २८४
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कर्ण उवाच
कीर्तिर्हि पुरुषं लोके सञ्जीवय़ति मातृवत् |  ३२   क
अकीर्तिर्जीवितं हन्ति जीवतोऽपि शरीरिणः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति