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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तामादाय़ापनेष्यामि ततः स न भविष्यति |  १३   क
भार्याविय़ोगाद्दुर्वुद्धिरेतत्साह्यं कुरुष्व मे ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति