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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् |  १६   क
मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति