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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
स धन्वी वद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् |  १९   क
अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति