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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः |  २   क
उवाच प्रश्रितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति