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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् |  २०   क
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं वुवुधे ततः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति