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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् |  २१   क
अमोघं शरमादाय़ जघान मृगरूपिणम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति