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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
स रामवाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा |  २२   क
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति