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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् |  २३   क
सा प्राद्रवद्यतः शव्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति