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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अलं ते शङ्कय़ा भीरु को रामं विषहिष्यति |  २४   क
मुहूर्ताद्द्रक्ष्यसे राममागतं तं शुचिस्मिते ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति