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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र वुद्धिं प्रणेष्यामि पाण्डवान्प्रति भारत |  ८   क
न तु नीतिः सुनीतस्य शक्यतेऽन्वेषितुं परैः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति