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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रिय़राघवः |  २९   क
पिधाय़ कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः |  २९   ख
स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति