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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् |  ३७   क
उपस्थाय़ महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति