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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु |  ५   क
प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीपं मधुसूदनः |  ५   ख
शमं प्रति महावाहो हितार्थं सर्वदेहिनाम् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति