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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्याथ नृपं प्रति |  ५   क
सचक्षुर्वाप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति