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शान्ति पर्व
अध्याय २६३
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भीष्म उवाच
ततोऽव्रवीत्कुण्डधारो दिव्यं ते चक्षुरुत्तमम् |  ४२   क
पश्य राज्ञां गतिं विप्र लोकांश्चावेक्ष चक्षुषा ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति