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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
सन्दष्टोष्ठं विवृत्ताक्षं फलं वृन्तादिव च्युतम् |  ६०   क
जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनवलाद्धृतम् |  ६०   ख
पपात रुधिरादिग्धं सन्दष्टदशनच्छदम् ||  ६०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति