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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
कथमुत्सृज्य वैदेहीं वने राक्षससेविते |  ११   क
इत्येवं भ्रातरं दृष्ट्वा प्राप्तोऽसीति व्यगर्हय़त् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति