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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सङ्गृह्य धनुषी शुभे |  १८   क
कोऽय़ं पितरमस्माकं नाम्नाहेत्यूचतुश्च तौ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति