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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपृच्छद्राघवो गृध्रं रावणः कां दिशं गतः |  २०   क
तस्य गृध्रः शिरःकम्पैराचचक्षे ममार च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति