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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
स राममभिसम्प्रेक्ष्य कृष्यते येन तन्मुखम् |  २७   क
विषण्णश्चाव्रवीद्रामं पश्यावस्थामिमां मम ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति