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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीलवैः |  ३०   क
अभिषिक्तस्य वदनं सोमं साभ्रलवं यथा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति