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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
मा विषीद नरव्याघ्र नैष कश्चिन्मय़ि स्थिते |  ३२   क
छिन्ध्यस्य दक्षिणं वाहुं छिन्नः सव्यो मय़ा भुजः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति