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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य देहाद्विनिःसृत्य पुरुषो दिव्यदर्शनः |  ३६   क
ददृशे दिवमास्थाय़ दिवि सूर्य इव ज्वलन् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति