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वन पर्व
अध्याय ५
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विदुर उवाच
स वै धर्मो विप्रलुप्तः सभाय़ां; पापात्मभिः सौवलेय़प्रधानैः |  ५   क
आहूय़ कुन्तीसुतमक्षवत्यां; पराजैषीत्सत्यसन्धं सुतस्ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति