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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
उक्त्वैवं राक्षसेन्द्रं तं चकर्त नखरैर्भृशम् |  ४   क
पक्षतुण्डप्रहारैश्च वहुशो जर्जरीकृतः |  ४   ख
चक्षार रुधिरं भूरि गिरिः प्रस्रवणैरिव ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति