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वन पर्व
अध्याय ६४
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ऋतुपर्ण उवाच
वस वाहुक भद्रं ते सर्वमेतत्करिष्यसि |  ५   क
शीघ्रय़ाने सदा वुद्धिर्धीय़ते मे विशेषतः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति