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उद्योग पर्व
अध्याय ४८
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कर्ण उवाच
किं चान्यन्मय़ि दुर्वृत्तं येन मां परिगर्हसे |  ३०   क
न हि मे वृजिनं किञ्चिद्धार्तराष्ट्रा विदुः क्वचित् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति