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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः |  ८०   क
कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षय़म् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति