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वन पर्व
अध्याय २६३
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मार्कण्डेय़ उवाच
निहत्य गृध्रराजं स छिन्नाभ्रशिखरोपमम् |  ६   क
ऊर्ध्वमाचक्रमे सीतां गृहीत्वाङ्केन राक्षसः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति