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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं ततोऽविध्यन्नवभिर्निशितैः शरैः |  १२८   क
जीवितान्तकरैः क्रुद्धः क्रुद्धरूपं परन्तपः ||  १२८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति