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शान्ति पर्व
अध्याय २६४
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भीष्म उवाच
ततः सुरुचिरं दृष्ट्वा स्पृहालग्नेन चक्षुषा |  १५   क
मृगमालोक्य हिंसाय़ां स्वर्गवासं समर्थय़त् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति