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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा समय़ं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् |  १५   क
अभ्येत्य सर्वे किष्किन्धां तस्थुर्युद्धाभिकाङ्क्षिणः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति