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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
यथा नदति सुग्रीवो वलवानेष वानरः |  १७   क
मन्ये चाश्रय़वान्प्राप्तो न त्वं निर्गन्तुमर्हसि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति