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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वभूतरुतज्ञा त्वं पश्य वुद्ध्या समन्विता |  १९   क
केनापाश्रय़वान्प्राप्तो ममैष भ्रातृगन्धिकः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति