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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
एक एव तु वीभत्सुः सोमकावय़वैः सह |  ३   क
मत्स्यैरन्यैश्च सन्धाय़ कौरवैः संन्यवर्तत ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति