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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
हृतदारस्य मे राजन्हृतराज्यस्य च त्वय़ा |  २९   क
किं नु जीवितसामर्थ्यमिति विद्धि समागतम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति