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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
उभौ रुधिरसंसिक्तौ नखदन्तपरिक्षतौ |  ३२   क
शुशुभाते तदा वीरौ पुष्पिताविव किंशुकौ ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति