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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स मालय़ा तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तय़ा |  ३४   क
श्रीमानिव महाशैलो मलय़ो मेघमालय़ा ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति