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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
कृतचिह्नं तु सुग्रीवं रामो दृष्ट्वा महाधनुः |  ३५   क
विचकर्ष धनुःश्रेष्ठं वालिमुद्दिश्य लक्ष्यवत् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति