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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
न त्वामेवंविधो भावः स्प्रष्टुमर्हति मानद |  ४   क
आत्मवन्तमिव व्याधिः पुरुषं वृद्धशीलिनम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति