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वन पर्व
अध्याय २३८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा स राजेन्द्र सस्वनं प्ररुरोद ह |  ३२   क
पादौ सङ्गृह्य मानार्हौ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति